Poonam | Festivals
2024-04-11

माँ दुर्गा (देवी) एक अदृश्य ब्राह्मणीय ऊर्जा जो इस ब्राह्मण का संचालन कर रही है और हम सब इस जगमगाती ब्राह्मणीय ऊर्जा में तैर रहे है। एक दिव्य स्वरूपा देवी माँ (माँ दुर्गा) इस समस्त सृस्टि का गर्भ है। ये दिव्य देवी जिन्हे समस्त संसार माँ दुर्गा के नाम से सम्बोधित करता है, समस्त गतिशीलता, तेजस्विता, सौंदर्य, समता, शांति और पोषण को अपने में समाये हुए है। जगतजननी माँ हम सब की जीवन शक्ति ऊर्जा है।
हर माँ अपने बच्चे से बहुत प्यार करती है। जगतजननी माँ जगदम्बा को अपने बच्चों(समस्त संसार के जीवों ) के प्रति बिना शर्त के अतुलनीय प्रेम है जिसमे ये समस्त संसार समाहित है।
नवरात्री में इन पवित्र नौ रातों के दौरान आदिशक्ति माँ जगदम्बा भवानी की नौ रूपों में पूजा की जाती है। देवी का प्रत्येक नाम और रूप एक विशेष गुण और माँ आंबे की शक्तियों को बताता है। जगतजननी माँ जगदम्बा भवानी के नौ रूपों स्मरण और उनके नामो का जाप करने से माँ की असीम कृपा और जाग्रत चेतना प्राप्त होती है। और समय की आवश्यकता के अनुसार देवी माँ हम सभी में आवश्यकता अनुसार प्रकट होती है।
नवरात्री में माँ दुर्गा के नौ नामो का जाप और यज्ञ विधि के माध्यम से माँ जगतजननी जगदम्बा का आह्वान किया जाता है। उत्पन्न ऊर्जा। सूक्ष्म दुनिया से लेकर हमारे अस्तित्व के अंतरतम केंद्र तक - स्वयं की यात्रा है।
नवरात्री के पहले तीन दिन जगदम्बा माँ को दुर्गा के रूप में पूजा जाता है। दुर्गा का मतलब एक अर्थ पहाड़ी भी होता है। माँ दुर्गा की उपस्थिति से बहरी दुनिया के साथ अंतर्मन की भी नकारात्मक शक्तियां समाप्त हो जाती हैं। माँ दुर्गा "जय दुर्गा " विजय दिलाने वाली कहा जाता है। माँ दुर्गा दुर्गति को हरने वाली है, बाधाओं को दूर करने वाली है। माँ दुर्गा नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदल देती है। माँ दुर्गा की उपासना मुश्किलों को कभी करीब नहीं आने देती है।
माँ दुर्गा की सवारी के रूप में शेर और बाघ को दर्शाया जाता है। जो साहस और वीरता का प्रतिक होता है। जो माँ दुर्गा का सार है। वीरता और साहस के साथ समस्त पापों का नाश कर देना।
नव दुर्गा - सकारात्मक ऊर्जा के नौ पहलु। जो नकारात्मकता को दूर करने के लिए भक्तो का ढाल बनते है। माँ की उपासना करने वालो के पास जब बाधाएं और मानसिक रूकावट हो, देवी माँ के इन गुणों को याद करने से ही सब ठीक हो जाता है। जिन लोगो के जीवन में चिंता, स्वयं पे अविश्वास,और अपनी क्षमताओं पे संदेह के कारण चेतना की कमी हो जाये और शत्रुओ था नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव महसूस हो तब केवल आदिशक्ति जगदम्बा भवानी का नाम जाप करने और मंत्रोउच्चारण से ही सभी बढ़ाओ से लड़ने का साहस मिलता है। ये माँ जगदम्बा के दिव्य ऊर्जा रूपों का एक दिव्य पहलु माँ महत्व है जिसे किसी सत्यता की आवश्यकता ही नहीं है।
माँ से जुड़ाव में एक विशेष सौंदर्य है। सभी गुणों का पोषण करती है। सकारत्मकता का पोषण करती है। सौभाग्यता का वर देती है जब हम सब अपनी माँ के साथ बहुत ही सुरक्षित होते है सभी 'उपहार उपलब्ध होते है। शक्तिशाली बन जाते है। सौभाग्य को बनाये रखने और प्राप्त करने में सक्षम बन जाते है। जीवन में साहस , समृद्धि और प्रचुरता की कोई कमी नहीं होती है। इन सभी गुणों को एक साथ लाने और सामंजस्य रखने के लिए और बढ़ाने के लिए माँ दुर्गा की उपासना और प्रार्थना के लिए नवरात्री एक विशेष समय होता है
वही दूसरी और अगर हम जीवन में सफल तो है लेकिन खुश नहीं है तो इस सफलता का कोई मायने नहीं है। इसके विपरीत यदि प्रयास करने के बावजूद भी सफलता नहीं मिलती है तो भी ये निराशाजनक होता है। दुर्गा ऊर्जा आपको सब कुछ एक साथ दे सकती है। ये सभी गुण एक साथ में उपलब्ध हो सकते है। हम माँ दुर्गा से प्राथना करते है ये सभी गुण हमारी चेतना में उपस्तित हो जाये। जिससे शारीरिक कल्याण के साथ भौतिक पूर्ति और आध्यात्मिक शांति मिले।
माँ दुर्गा का सम्बन्ध लाल रंग से है। उन्हें लाल सदी पहने हुए दिखाया जाता है। लाल गतिशीलता को व्यक्त करता है। किसी भी कार्य में आप सर्वश्रेस्ट और कुशल हो सकते है लेकिन जीवन में अगर आगे बढ़ते रहना है तो निरंतरता बहुत जरूरी है। क्युकी यदि आप अपने सभी प्रयासों के एक साथ लेकर आगे बढ़ने और लोगो को अपने साथ आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं है तो सफलता का फल मिलने में देरी हो सकती है। लेकिन जब हम माँ दुर्गा की उपासना और प्रार्थना करते है ये संभव हो सकता है की सफलता के मार्ग में हमेशा निरन्तर आगे बढ़ते र
माँ दुर्गा महिषासुर मर्दिनी की विनाशक है। महिष शब्द का अर्थ होता है भैंस अर्थात आलस्य , सुस्ती और जड़ता का प्रतिक। ये तामसिक गुण है जो किसी भी व्यक्ति के आध्यात्मिक और बौद्धिक विकास में बाधा डालते है। माँ दुर्गा ऊर्जा का भंडार है। और उनकी उपस्थिति में आलस्य और जड़ता का अंश मात्र भी नहीं रहता है
चौथे नवरात्रे से लेकर छठे नवरात्री तक माँ जगतजननी जगदम्बा भवानी की लक्ष्मी रूप में उपासना की जाती है। माँ लक्ष्मी धन धान्य और सौभाग्य का प्रतिक है। धन जीवन निर्वाह के लिए और प्रगति के लिए जरूरी होता है। लकिन सिर्फ पैसा होना पर्याप्त नहीं है। अर्थात जरूरी है - ज्ञान , कौशल और प्रतिभा की प्रचुरता। माँ लक्ष्मी ऊर्जा का वो स्वरुप है जो व्यक्ति के सम्पूर्ण आध्यात्मिक और भौतिक सुख सुविधाओं का आशीर्वाद देती है।
और अंतिम के दिन माँ सरस्वती को समर्पित है। माँ सरस्वस्ती जिन्हे ज्ञान की देवी कहा जाता है। सम्पूर्ण ज्ञान की ऊर्जा माँ सरस्वती। माँ सरस्वती को तपस्वी की भाँती पर्वत पे बैठे हुए चित्रित किया जाता है। ज्ञान, चट्टान की तरह, एक दृढ़ सहारा है। माँ सरस्वती वीणा बजाती है। वीणा एक ऐसा संगीत वाद्य यंत्र है जिससे मधुर स्वर और मन को शांति देने वाली धून निकलती है। आध्यात्मिक ऊर्जा का ज्ञान हमारे जीवन में शांति और विश्राम देता है।
देवी सरस्वती की कृपा से हमारी चेतना में समझ और जाग्रति पैदा होती है। शिक्षा का प्रसार होता है। जीवन आध्यात्मिक प्रकाश से रोशन होता है सभी अज्ञानता रुपी अंधकार हट जाता है।
आदिशक्ति के नौ रूपों की पूजा करते समय चमेली, हिबिस्कस, कमल, लिली, गुलाब, आदि जैसे कई रंगों और सुगंधों वाले फूल चढ़ाना चाहिए। बाहरी सुंदरता को देख कर हम अपना ध्यान अंदर की तरफ मोड़ लेते है उसी तरह देवी माँ के दिव्य गुण हमारे चेतना रुपी फूलों से खिल उठते है। शुद्ध चेतना के साथ माता रानी की पूजा करने से परम आनंद और फल की प्राप्ति होती है।
हम सभी प्रार्थना अपनी इच्छाओ की पूर्ति के लिए करते है। और जब हम पूर्णता को प्राप्त कर लेते है तो निरन्तर प्रतिक्रिया बन जाती है। जब हम एक सफलता को प्राप्त कर लेते हिअ तो पुनः ओर चाहने के लिए प्यार करने लग जाते है। जरूरी नहीं है एक कार्य में सफलता मिलने से संतुष्टि मिल जाये। चेतना गतिशील होती है। और गतिशीलता को बनाये रखने के लिए प्रार्थना जरूरी है। लेकिन केवल गतिशील निरंतरता ही काफी नहीं है आध्यात्मिक शांति को महसूस करना भी जरूरी है।
परमात्मा सम्पूर्ण सृष्टि को संचालित करते है अर्थात परमात्मा ही सम्पूर्ण सृष्टि है। इस संसार की प्रत्येक वास्तु ओर सभी जीव में तीन गुण होते है - सत्व , रज और तम। सत्व गुण मन की शांति , उत्साह और स्पष्टता से जुड़ा है। कार्य करने के लिए रज गुण जरूरी है और तमस की अधिकता से आलस्य , सुस्ती , और अवसाद उत्पन्न होता है। इस पृथ्वी का प्रत्येक प्राणी इन्ही गुणों में खेलता रहता है। अब सवाल ये उठता है की इस चक्र से बाहर कैसे निकला जाये ? इन सीमाओं से कैसे पार पाया जाये
इन गुणों पे विजय प्राप्त करने के लिए उचित ध्यान मौन और भोजन पे नियंत्रण की आवश्यकता है। क्युकी बाहेर आने के लिए सत्व को बढ़ाना जरूरी है। ये सम्पूर्ण प्रकर्ति रात और दिन, गर्मी और सर्दी, दर्द और खुशी दुःख , तकलीफ जैसे विरोधाभास को उत्पन्न करती है। इन सभी सांसारिक जाल से ऊपर उठकर ही शिव तत्व की प्राप्ति होती है।
सभी पूजाओ का एकमात्र उद्देश्य होता है दिव्य ऊर्जा को उत्पन्न करना। क्यकि इस देवीय ऊर्जा को प्राप्त करके ही व्यक्ति इन गुणों से पार पा सकता है। सर्वोच्चता, अविभाजित, अविभाज्य, शुद्ध, अनंत चेतना की प्राप्ति इस दिव्य ऊर्जा की उपासना से ही मिलती है।
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