Hitesh | Festivals
2024-04-20

अक्षय का अर्थ है कभी समाप्त ना होने वाला अर्थात अक्षय तृतीया के दिन जो भी आप पूजा अर्चना जप ,तप ,नाम जाप, हवन, दान आदि करते हैं वह अक्षय हो जाता है। अर्थात उसका पुण्य कभी भी समाप्त नहीं होता।, उस किये गए दान का भगवान् आपको कोठी गुणा करके प्रदान करते हैं। आप सभी जानते हैं अक्षय तृतीया विशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि को आती है जो कि इस बार कुछ लोग 10 अप्रैल को मना रहे हैं और कुछ 11 मई को क्योंकि 10 मई को तृतीय तिथि सुबह 4:17 पर प्रारंभ होगी और 11 मई को सुबह 2:50 तक रहेंगी। उदय तिथि होने के कारण कुछ लोग इसे 10 मई को मनाएंगे। और कुछ 11 मई को Iअक्षय तृतीया के दिन आपको प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल को नहाने के जल में मिलाकर स्नान करना चाहिए , क्योंकि अक्षय तृतीया के दिन ही गंगा जी धरती पर अवतरित हुई थी। इस दिन बहुत से लोग हरिद्वार में गंगा जी में स्नान के लिए जाते हैं।
स्नान के बाद।आप ठाकुर जी को भी स्नान कराएं और फिर उन्हें चंदन से लेप करें। अक्षय तृतीया के दिन ठाकुर जी को चंदन लेपन करना बहुत आवश्यक हैI उसके बाद भगवान को फूलों में बिठाएं और फिर उनके समक्ष मिट्टी के बर्तन में जल अर्पित करें। शुद्ध देसी घी का दीपक जलाये और भगवान को खरबूजा, आम, खीरा अर्पित करें। और उसके बाद ठाकुर जी को सत्तू का भोग लगाएं। सत्तू मक्का या चने को भूनकर उसमे शक्कर मिलाकर बनाया जाता है I दोस्तों अक्षय तृतीया के दिन माता लक्ष्मी की पूजा का विधान है। इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा करें लक्ष्मी माँ को गुलाब के फूल अर्पित करें और फिर उनको खीर का भोग लगाएं, इसके बाद श्री सूक्त का पाठ करें या फिर सुने। दोस्तों अक्षय तिथियों के दिन अन्नपूर्णा जयंती भी मनाई जाती है। इसलिए इस दिन आप गायों को हरा चारा आटे में शक्कर मिलाकर पेड़े बनाकर गायों को खिलाये । और उसके साथ पक्षियों को दाना दे, ब्राह्मण को छतरी और चप्पल का दान भी करें यदि किसी ने बहुत ही बुरे भी कर्म किये हैं, वे भी यदि अक्षय तित्य के दिन। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर, ब्राह्मण को छतरी और चप्पल का दान कर देता है और शाम के समय ब्राह्मण को शरबत पीला देता है तो उसके जन्म जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। अक्षय तृतीया के दिन आप जितना अधिक स्नान दान जब तप करेंगे, भगवान आपको कोठी गुणाकर वापस करेंगे.
अक्षय तृतीया के दिन घर में एक तुलसी का पौधा अवश्य लाएं। इस दिन सोना खारिधना बहुत ही शुभ माना जाता है । यदि आप सोना नहीं खरीद सकते तो अक्षय तृतीया के दिन चने की दाल जरूर अपने घर खरीद के लाये क्योकि चने की दाल को समतुल्य माना जाता है अक्षय तिथि के दिन आप किसी का भी दिल न दुखाये और बाल आदि को इस दिन न कटवाए और ना ही दाढ़ी शेव करवाए। दोस्तों इस दिन जलदान अवश्य ही करे और भूलकर भी इस दिन मांस मंदिर का सेवन न करे I
अक्षय तृतीया के बारे में बहुत सारी व्रत कथाएँ प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कहानी कहती है कि प्राचीन काल में एक वैश्य धर्मदास था। वह सदाचारी थी और देवताओं और ब्राह्मणों के प्रति बहुत श्रद्धालु थी। उसने व्रत के माहात्म्य को जानकर गंगा में स्नान करके विधिपूर्वक देवी-देवताओं की पूजा की और व्रत के दिन स्वर्ण, वस्त्र और दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दी।अनेक रोगों से पीड़ित होने पर भी उसने उपवास करके धार्मिक कार्यों और दानों का पुण्य किया। दूसरे जन्म में यही वैश्य कुशावती का राजा बना।कहा जाता है कि अक्षय तृतीया पर दान और पूजन करने से वह बहुत धनी और प्रतापी बना। वह बहुत धनी और प्रतापी राजा था कि अक्षय तृतीया के दिन त्रिदेव तक उसकी सभा में ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। महान वैभवशाली होने पर भी वह अपनी भक्ति और श्रद्धा का कभी घमण्ड नहीं करता था। माना जाता है कि यही राजा बाद में राजा चंद्रगुप्त बन गया।
स्कंद पुराण और भविष्य पुराण बताते हैं कि भगवान विष्णु ने वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से परशुराम का जन्म लिया था। इस तिथि को कोंकण और चिप्लून में परशुराम जयन्ती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयन्ती बहुत महत्वपूर्ण है। यह तिथि परशुराम जयन्ती भी होती है, क्योंकि इस दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ था।माना जाता है कि इस दिन परशुराम जी की पूजा करके उन्हें अर्घ्य देना बहुत महत्वपूर्ण है। इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियाँ और क्वारी कन्याएँ गौरी की पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुए चने बाँटती हैं, और गौरी-पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल और अन्न देती हैं। इसी दिन ब्राह्मण और क्षत्रिय भृगुवंशी परशुराम का जन्म हुआ था। एक कहानी कहती है कि विश्वामित्र की माता और परशुराम की माता के पूजन के उपरान्त ऋषि ने प्रसाद को बदलकर दिया था।जिसकी वजह से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे और विश्वामित्र भी क्षत्रिय पुत्र था, इसलिए उन्हें ब्रह्मर्षि कहा जाता था। उल्लेख है कि सीता के स्वयंवर के दिन परशुराम अपना धनुष बाण श्री राम को देकर संन्यासी बन गए। उनका नाम परशुराम था क्योंकि वे एक परशु साथ रखते थे।
निष्कर्ष
भारतीय त्योहारों में अक्षय तृतीया का खास महत्व है. इस दिन को बेहद शुभ माना जाता है. इस साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया यानी अक्षय तृतीया 10 मई को पड़ रही है. अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयंसिद्ध मुहूर्त है, कोई भी शुभ कार्य का प्रारंभ किया जा सकता है. अक्षय तृतीया का पर्व मुख्य रूप से सौभाग्य के लिए जाना जाता है. इस दिन का महत्व सुंदर और सफलतम वैवाहिक जीवन के लिए सबसे अधिक माना जाता है. आइए ऐसे में जानते हैं कि आखिर क्यों अक्षय तृतीया को मनाया जाता है और इस तिथि में ऐसा क्या है कि इस दिन किए गए हर काम का आपको शुभ फल मिलता है.
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